प्यास वो दिल की​

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प्यास वो दिल की​..
प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं​
​कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं​
​बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी​
​एक मुद्दत से हमें उस ने सताया भी नहीं​

रोज़ आता है दर-ए-दिल पे वो दस्तक देने​
​आज तक हमने जिसे पास बुलाया भी नहीं​

सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने​
.
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं​

तुम तो शायर हो "क़तील" और वो इक आम सा शख़्स​
.
उसने चाहा भी तुझे और जताया भी नहीं​

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