वफ़ाएँ कर के

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वफ़ाएँ कर के..
वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा
इसी तरह से ज़माने को आज़माए जा
किसी में अपनी सिफ़त के सिवा कमाल नहीं
जिधर इशारा-ए-फ़ितरत हो सिर झुकाए जा
वो लौ रबाब से निकली धुआँ उठा दिल से
वफ़ा का राग इसी धुन में गुनगुनाए जा
नज़र के साथ मोहब्बत बदल नहीं सकती
नज़र बदल के मोहब्बत को आज़माए जा
ख़ुदी-ए-इश्क़ ने जिस दिन से खोल दीं आँखें
है आँसुओं का तक़ाज़ा कि मुस्कुराए जा
थी इब्तिदा में ये तादीब-ए-मुफ़लिसी मुझ को
ग़ुलाम रह के गुलामी पे मुस्कुराए जा

This is a great अपनी पहचान शायरी. If you like कमाल की शायरी then you will love this. Many people like it for गुलामी शायरी.

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