आरजू की थी इक आशियाने की

SHARE

आरजू की थी इक आशियाने की
आंधियां चल पड़ी ज़माने की
मेरे ग़म को कोई समझ ना पाया
क्योंकि मुझे आदत थी मुस्कुराने की!

This is a great आरजू पर शायरी.

SHARE