वो जज़्बों की तिजारत थी

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वो जज़्बों की तिजारत थी, यह दिल कुछ और समझा था
उसे हँसने की आदत थी, यह दिल कुछ और समझा था
मुझे देख कर अक्सर वो निगाहें फेर लेते थे
वो दर-ए-पर्दा हकारत थी, यह दिल कुछ और समझा था
शब्दार्
हकारत = नफर

This is a great नफरत पर शायरी. If you like कातिल निगाहें शायरी then you will love this. Many people like it for हँसने की शायरी. Share it to spread the love.

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