गम-ए-जिंदगी को:

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गम-ए-जिंदगी को
गम-ए-जिंदगी को इस कदर सँवार लेते हैं
जाम होंठो से जिगर तक उतार लेते हैं
तबाह होने की चाह में क्या-क्या करें हम
एक रोग नया तेरे इश्क का आज़ार लेते हैं
माना कि फांसलों से ही नजदीकीयाँ अपनी मगर
दिल कहे, सुनेंगे कभी, एक दफा पुकार लेते है
एक भी काम ना आया मशवरा तुझे भुलने का
मगर, तेरी याद के लम्हें वक्त से बेशुमार लेते हैं
ये मय ही तो हमदर्द , हमसफर मेरा अब साक़ी
दर्द मिटाने को दवा कहा इश्क के बीमार लेते हैं

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