ऊपर वाले शायरी

​​ऐसे चुप है कि ये मंज़िल​

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​वो मेहँदी वाले हाथ​

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दोनों जहाँ देके वो

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ऐसे चुप है

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लोग हर मोड़ पे

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सर-ए-सहरा मुसाफ़िर को

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